सदस्य आदित्य ताम्हनकर राहत असलेले शहर
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सदस्य आदित्य ताम्हनकरने तयार केलेल्या याद्यासंपादन करा

खंगलेलं शरीर आणि पोटच्या पोराच्या मृत्यूच्या दु:खात बुडालेला हा पेशवा सरतेशेवटी २१ जून १७६१ रोजी निधन पावला.

राक्षसभुवन की लडाई (The Battle of Rakshasbhuvan)

पृष्ठभूमी :

१४ जनवरी १७६१. मंकरसंक्रांती का दिन. पानीपत की रणभूमीमे सदी का सबसे भीषण युद्ध लडा जानेवाला था. एक तरफ थी सेनापती सदाशिवरावभाऊ पेशवा के नेतृत्व मे मराठा साम्राज्य की १ लाख फौज. तो सामने खडी थी अफगाण लुटेरा अहमदशाह अब्दाली की फौज. जिसके साथ थे रोहिलखंड नवाब नजीबखान रोहिल्ला और अवध का नवाब शुजा-उद-दौला. १७०७ मे मुघल बादशाह औरंगजेब के मृत्यू के बाद उत्तर हिंदुस्थानमे पुन: हिंदु राज्ये उभरने लगी. पंजाब मे शिखोंने अपना झंडा लहरा दिया था तो दुसरी तरफ भरतपूरमे राजा सूरजमल के नेतृत्व मे जाटोंने भी मुघलों के खिलाफ बगावत कर डाली. बुंदेलखंडनरेश महाराजा छत्रसालने भी अपना राज्य स्थापित कर दिया. इसी बीच १७१४ मे पेशवा बालाजी विश्वनाथ के नेतृत्व मे पचास हजार मराठा फौजने दिल्ली पर हमला किया. ७०० साल बाद दिल्ली शहर मे भगवा ध्वज लेकर किसी फौजने प्रवेश किया था. वर्तमान बादशाह को बरखास्त कर पेशवा ने कठपुतली बादशाह को दिल्ली के तख्त पर बिठाया. साफ था. मुघलों का पतन शुरु हो गया था. १७३० तक बाजीराव पेशवा के नेतृत्व मे मराठा साम्राज्यने अपनी सिमाए दिल्ली तक फैला दी. शिख, जाट, रजपूतोंने साथ आकर मराठों का साथ दिया. १७५० मे अफगाण शासक अहमदशाह अब्दालीने भारत पर आक्रमण किया. उसने पंजाब, अंतर्वेद, काश्मीर को कब्जे मे लिया. मुघल फौज की हार हुई. मुघल-मराठा संधी के मुताबिक रघुनाथराव पेशवा, दत्ताजी शिंदे, अंताजी माणकेश्वर, मल्हारराव होळकर के अगुवाई मे मराठा फौजने दिल्ली पर स्वारी की. अफगाण सेना को परास्त कर पेशावर, लाहोर पर भी मराठोंका कब्जा हो गया. मराठा-अफगाण के बीच कडवाहट बढ गई. दो साल के भीतर फिरसे अब्दालीने भारत पर स्वारी की. इस बार पुणे से पेशवा के चचेरे भाई सदाशिवरावभाऊ पेशवा के अगुवाई मे मराठा फौजने दिल्ली पर हमला बोला. एक दुसरे की सेना का पिछा करना, एक दुसरे की रसद रोकने की कोशिश करना ये सब होने के बाद दोनो सेनाए १४ जनवरी १७६१ इस दिन पानीपत की रणभूमीपर भिड गई. भीषण युद्ध हुआ. पेशवापुत्र विश्वासराव के पतन के बाद मराठा फौज तितरबितर हो गई. सदाशिवभाऊ खूद हत्तीसे उतर कर घोडे पे स्वार हो गए. वे भी वीरगती को प्राप्त हो गए. सरदार जनकोजी शिंदे, शमशेर बहादूर, इब्राहिमखान गारदी समेत अनगिनत मराठा सेनानी इस युद्ध मे मारे गए. ये युद्ध इतना भीषण था की अब्दालीने पुन: भारत पर आक्रमण नही किया. परंतु हिंदुस्थानमे अब राजनीती एक नया मोड लेनेवाली थी.

पानिपत युद्ध का परिणाम :

पानिपत रणसंग्राम के पश्चात उत्तर हिंदुस्थानमे मराठा साम्राज्य का वर्चस्व खतरे मे पड गया था. अब्दाली के दहशत से मुघल बादशाह शाह आलम भाग गया. दिल्ली पर नजीबखान रोहिल्ला ने कब्जा कर तख्त पर अपने उंगलीयों पे नाचने वाला कठपूतली बादशाह को बिठा दिया. युद्ध मे मिली पराजय का सदमा इतना जबरदस्त था की पेशवा नानासाहेब इससे कभी उभर नही पाए. बिगडती हुई तबीयत, क्षीण होता शरीर और अपने पुत्र, भाई के निधन के लिए खुदको जिम्मेदार ठहराते हुए अंतत पेशवा नानासाहेब ने २१ जून १७६१ को पुणे के शनिवारवाडा मे प्राण त्याग दिए. उत्तर मे मराठा साम्राज्य का खत्म होता हुआ वर्चस्व, अनगिनत शूर सेनानी की मृत्यू के कारण आत्मविश्वास खोई हुई मराठा फौज की स्थिती का फायदा उठाकर हैदराबाद के निजामने पुणे पर स्वारी करने की ठान ली. तो यहा पुणे मे सत्तासंघर्ष छिड गया. पेशवा के सगे भाई रघुनाथराव, पेशवा बनना चाहते थे. परंतु परंपरा के अनुसार छत्रपती राजाराम महाराजने नानासाहेब हे द्वितीय पुत्र माधवराव को पेशवापद दिया. केवल १६ वर्ष की आयु मे माधवराव ने पेशवापद का कार्यभार संभाला. माधवराव पेशवा के सामने सबसे बडी चुनौती यह थी की वे फिरसे मराठा साम्राज्य का वर्चस्व स्थापित कर दे. पानिपत की हार का बदला ले. राजनितीक स्थिती कुछ और इशारा कर रही थी.

मराठा साम्राज्य मे बगावत, चाचा-भतिजा आमनेसामने :

अपना राजनैतिक अनुभव, युद्ध मे दिखाए गए शौर्य का प्रदर्शन, कुशल प्रशासन मे निपुण रह चुके नानासाहेब के सगे भाई रघुनाथराव को पेशवापद ना देकर मराठोंने भविष्य मे होनेवाले आपसी संघर्ष को न्योता दिया. माधवराव पेशवाने पहले दिन ही कई निर्बंध लगा दिए. इससे आहत होकर और अपने अधिकार को ठेस पहुंचता देख रघुनाथराव नाराज हो गए. एक दिन उन्होने हैदराबाद के निजाम से हात मिलाकर खुली बगावत कर डाली. चाचाने अपने भतिजे का साथ छोड दिया. निजाम और रघुनाथराव की संयुक्त फौजने पुणे की तरफ कूच की. युद्ध अब अटल था. अब सारे दरबार की नजर थी पेशवा पर. मंत्रिमंडळने संधी कर राज्य पर आई आपत्ती को टालने का सुझाव दिया. माधवराव ने निजाम के मनसुबे पहचान लिए थे. पेशवा ने ऐलान किया की अब संधी नही रण होगा. राज्य को बचाने अपने सगे चाचा के विरुद्ध १६ वर्ष का पेशवा पुरी सेना के साथ सज्ज हो गया. माधवराव की फौजने पुणे से निकल कर आलेगाव मे डेरा डाल दिया. निजाम की सेना ने तिसरे दिन भीमा नदी को पार किया. दोनो सेनाए आमनेसामने खडी हुई. माधवराव ने एक बार अपने चाचा से याचना की. आप जो चाहते है वो मे देने के लिए तयार हु. यह रही पेशवा की पगडी. मुझे कुछ नही चाहिए. मुझे राज्य की लालसा नही. आप संभाल लो राज्य. परंतु कृपा करके शत्रु को घर मे फूट डालने का अवसर मत दिजीए. लेकीन कोई परिणाम नही हुआ. निजामने रघुनाथराव के साथ संधि की थी. रघुनाथराव ने सेना के साथ माधवराव पेशवा पर चढाई की. आलेगाव मे रण हुआ. पेशवा की फौज परास्त हुई. पेशवा माधवराव गिरफ्तार हुए. रघुनाथराव ने पेशवा का पदभार संभाला.

चाचा-भतिजा फिरसे एक, राक्षसभुवन मे निजाम की हार :

आलेगाव मे पेशवा को परास्त कर रघुनाथराव ने निजाम से की हुई संधी के अनुसार मराठोंका कुछ प्रदेश निजाम को दिया. और वे बंदी बनाए गए 'पूर्व' पेशवा माधवराव के साथ कोल्हापूर की तरफ बढने लगे की तभी अचानक उन्हे खबर मिली की निजामने संधि का उल्लंघन कर पुणे पे हमला बोल दिया है, इससे रघुनाथराव का क्रोध बढ गया. माधवराव ने पहले से ही ऐसी स्थिती पैदा हो सकती है ऐसी आशंका जताई थी. परंतु रघुनाथराव ने इसे अनदेखा कर दिया था. इसका परिणाम पुरे साम्राज्य को भुगतना पड रहा था. पुणे मे आगजनी हुई, आपसी मतभेद चरमसिमा पर था. माधवराव के सगे मामा और पुणे के सुभेदार मल्हार पेठे इन्होने निजाम फौज के सामने घुटने टेक दिए. पुणे के लूट, आगजनी, बलात्कार जैसी घटनाए शुरू हो गई. शनिवारवाडा पर लहराने वाला भगवा ध्वज गिरने की कगार पर था. मराठोंका आत्मविश्वास टूट चुका था. रघुनाथराव को लिए हुए निर्णय पर पचतावा होने लगा. मंत्रि सखारामबापू बोकील ने फौज को पुणे की तरफ कूच करने का सुझाव दिया. रघुनाथराव परेशान हो गए थे. क्या करे उन्हे कुछ समझ नही आ रहा था. आखिरकार उन्होने अपने भतिजे माधवराव से पुछा. माधवराव बोल पडे, "काका, फौज को पुणे ले जाकर कुछ हासील नही होगा, अगर घर मे घुसे शत्रू को बाहर निकालना है तो शत्रू के घर मे घुसना ही उचित होगा." रघुनाथराव रोने लगे. उन्होने माधवराव से क्षमा मांगी. उनके मोह के कारण पुरे साम्राज्य पर विपदा आ गई. माधवराव ने उन्हे शांत किया और बोले की "परकियांपेक्षा आप्तस्वकिय श्रेष्ठ" यानी बाहरवालों से ज्यादा अपने लोग ही श्रेष्ठ होते है. चाचा-भतिजे मे सुलह हो गई. दोनो फिरसे एक हुए. मराठा ताकत फिरसे एक हुई. रघुनाथराव ने माधवराव को पुन: पेशवा पगडी देकर उनका सम्मान किया. सेना सज्ज थी. अब बारी थी निजाम की उपराजधानी औरंगाबाद!

१० अगस्त १७६३ इस दिन मराठा फौज ने औरंगाबाद के नजदीक राक्षसभुवन गाव के मैदान मे निजाम के फौज पर हमला बोल दिया. माधवराव स्वयं रणभूमीपर उतरे. भीषण युद्ध छिड गया. निजाम का दिवाण विठ्ठल सुंदर मारा गया. नारो शंकर दाणी के अगुवाई मे मराठा घुडसवार तुकडी ने निजामी फौज की धज्जिया उडा दी. मराठा साम्राज्य के खिलाफ जाकर निजाम से हात मिलाने वाले अनेक सरदारों को मृत्यूदंड दिया गया. सरदार संताजीराव वाबळे, सहदेव आपटे, नानासाहेब निंबाळकर, इस्माईलखान गारदी ने निजामी फौज को दक्षिण से घेर लिया. मल्हारराव होळकरने तीरंदाजी तुकडी के मदद से किले पर बाणों की वर्षा की. मराठा सेना के गजदल ने शत्रू के अनगिनत सैनिकों को कुचल दिया. माधवराव दोनो हाथ मे तलवार लेकर युद्ध करने लगे. मराठोंने औरंगाबाद पे आक्रमण किया यह खबर सुनकर पुणे की दुर्दशा करने मे व्यस्त निजाम ने पुणे छोड अपने उपराजधानी को बचाने का निर्णय लिया. इधर राक्षसभुवन मे मराठा फौज पुरे जोश मे आकर आगे बढने लगी. किलेपर भगवा ध्वज लगने की कगार पर था. निजामी फौज घबराने लगी. औरंगाबाद का सुभेदार हामिद उल्ला खान बिच लडाई छोड भाग गया. रघुनाथराव ने उत्तर दिशा से घुडसवार तुकडी लेकर किले के दरवाजे पर धावा बोल दिया था. करीब ६ घंटे लडकर थकने के निजाम के सेनापती और उसका सगा भाई सलाबत जंग ने किले के उपर सफेद ध्वज फहरा दिया. मराठा खेमे मे खुशी की लहर छा गई. सलाबत जंगने संधि का प्रस्ताव रखा. मराठोंने पुणे का जो नुकसान हुआ उसके भरपाईस्वरूप पचास लाख निजाम से वसुले. भालकी, बिदर, कोयगाव जैसे समृद्ध प्रदेश मराठोंको मिल गए. राक्षसभुवन मे मिली जीत से मराठों मे फिरसे आत्मविश्वार बढ गया था. माधवराव ने सेना को एकजूट कर कर्नाटक, तमिलनाडू को कब्जे मे लिया. पानिपत के पराजय से टूटती हुई मराठा ताकत मे एक नयी उर्जा जागृत हुई. इस लडाई के परिणामसे निजाम ने अगले १० वर्ष तक कभी भी मराठों के खिलाफ युद्ध नही छेडा. माधवराव के नेतृत्व मे मराठोंने उत्तर मे चढाई की. १४ फरवरी १७७२ को सरदार महादजी शिंदे ने दिल्ली पर कब्जा कर भगवे ध्वज को पुन: लाल किले पर फहर दिया. पेशवापद को संभालते समय जो शपथ माधवराव ने ली थी उसको पुरा होता देखा. रणभूमी मे कभी भी हार न माननेवाले माधवराव पेशवा जीवन की लडाई मे मात्र हार गए. १७७२ मे दिल्ली पर पुन: मराठा वर्चस्व स्थापित करने के बाद कुछ दिन बाद ही क्षयरोग से हारकर केवल २७ वर्ष की आयु मे श्रीमंत माधवराव पेशवा का निधन हो गया. राक्षसभुवन की लडाई मराठा इतिहास मे एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है